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भारत और चीन को लेकर रेटिंग एजेंसियों का दृष्टिकोण है अंसगत, सुब्रमण्‍यन ने की वैश्विक एजेंसियों की आलोचना

मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने अर्थव्यवस्था में स्‍पष्‍ट सुधार के बाद भी रेटिंग में सुधार न करने को लेकर वैश्विक रेटिंग एजेंसियों की आलोचना की।

Abhishek Shrivastava | May 11, 2017 | 5:50 PM
भारत और चीन को लेकर रेटिंग एजेंसियों का दृष्टिकोण है अंसगत, सुब्रमण्‍यन ने की वैश्विक एजेंसियों की आलोचना

बेंगलुरु। भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने भारतीय अर्थव्यवस्था के बुनियादी कारकों में स्‍पष्‍ट सुधार के बावजूद भारत की रेटिंग में सुधार नहीं करने को लेकर वैश्विक रेटिंग एजेंसियों की आलोचना की है। उन्‍होंने कहा कि रेटिंग एजेंसियां भारत और चीन के मामले अलग मानदंड अपना रही हैं।

वैश्विक एजेंसियों ने भारत को सबसे निचले निवेश ग्रेड में रखा है, जिससे वैश्विक बाजारों में ऋण की लागत ऊंची पड़ती है, क्‍योंकि इससे निवेशकों की अवधारणा जुड़ी होती है। उन्‍होंने कहा, दूसरे शब्‍दों में कहा जाए रेटिंग एजेंसियों का चीन और भारत को लेकर नजरिया उचित नहीं है और यह असंगत है। एजेंसियों के इस रिकॉर्ड को देखते हुए-जिसे हमें खराब मानक कहते हैं- मेरा सवाल यह है कि, हम इन रेटिंग एजेंसियों के विश्लेषण को गंभीरता से क्यों लेते हैं।

सबप्राइम संकट का उदाहरण देते हुए उन्‍होंने कहा कि मार्गेज समर्थन वाली प्रतिभूतियों को एएए रेटिंग का प्रमाणपत्र देने को लेकर भी उनकी भूमिका पर सवाल उठे थे, अमेरिका के 2008 के वित्तीय संकट में ऐसी दूषित संपत्तियां भी शामिल थीं। उन्‍होंने कहा कि इसके अलावा वित्तीय संकट को लेकर पहले से चेतावनी नहीं देने की विफलता को लेकर भी उनपर सवाल उठे थे। यह भी पढ़ें: माइक्रोमैक्स ने लॉन्च किया कैनवास 2, स्मार्टफोन खरीदने पर मिलेगी एक साल तक फ्री 4G सर्विस

दास भी जता चुके हैं विरोध

आर्थिक मामलों के सचिव शक्तिकान्त दास ने भी पिछले सप्ताह वैश्विक रेटिंग एजेंसियों के प्रति नाराजगी जताते हुए कहा था कि उनकी रेटिंग जमीनी सच्‍चाई से कोषों दूर है। उन्होंने रेटिंग एजेंसियों को आत्म निरीक्षण करने की हिदायत भी दी थी। उन्होंने कहा कि जो सुधार शुरू किए गए हैं उन्हें देखते हुए निश्चित ही रेटिंग में सुधार का मामला बनता है।

भारत कर रहा है पुरजोर विरोध

भारत पहले भी रेटिंग एजेंसियों के तौर तरीकों पर सवाल उठाता रहा है। भारत का कहना है कि भुगतान जोखिम मानदंडों के मामले में दूसरे उभरते देशों के मुकाबले भारत की स्थिति अधिक अनुकूल है। विशेषरूप से एसएंडपी ग्लोबल रेटिंग्स पर सवाल उठे हैं, जिसने बढ़ते कर्ज और घटती वृद्धि दर के बावजूद चीन की रेटिंग को एए- रखा है। वहीं भारत की रेटिंग को कबाड़ या जंक से सिर्फ एक पायदान ऊपर रखा गया है।

मूडीज और फिच ने भी इसी तरह की रेटिंग दी है। इसके लिए इन एजेंसियों ने एशिया में सबसे अधिक राजकोषीय घाटे का उल्लेख किया है, जिससे भारत की सॉवरेन रेटिंग प्रभावित हुई है।

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