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जनता का ध्यान खींचने में असफल रही हैं सोने में निवेश वाली सरकारी योजनाएं : IIM-A

सरकार की सोने में निवेश को लेकर शुरू की गई विभिन्न प्रकार की योजनाएं आम जनता का ध्यान खींचने में असफल रहीं हैं। IIM-A के अध्ययन में यह निष्कर्ष सामने आया है

Manish Mishra | May 16, 2017 | 2:37 PM
जनता का ध्यान खींचने में असफल रही हैं सोने में निवेश वाली सरकारी योजनाएं : IIM-A

अहमदाबाद। सरकार की सोने में निवेश को लेकर शुरू की गई विभिन्न प्रकार की योजनाएं आम जनता का ध्यान खींचने में असफल रहीं हैं। IIM-A द्वारा किए गए अध्ययन में यह निष्कर्ष सामने आया है। इसमें कहा गया है कि आम जनता के बीच इन निवेश योजनाओं को लेकर अधिक जानकारी नहीं है। इंस्टीट्यूट फॉर फाइनेंशियल मैनेजमेंट एंड रिसर्च (IFMR) के शोधकर्ताओं ने यह अध्ययन किया और इसके लिए भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIM), अहमदाबाद के भारत स्वर्ण नीति केन्द्र (IGPC) ने फाइनेंस किया था। देश के चार जिलों महाराष्ट्र में कोल्हापुर, तमिलनाडु में कोयंबटूर, पश्चिम बंगाल में हुगली और उत्तर प्रदेश में सहारनपुर में 1,000 लोगों के बीच यह अध्ययन किया गया। IGPC के प्रमुख प्रोफेसर अरविंद सहाय ने यह जानकारी दी।

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अध्ययन में जो बात सामने आई वह एक तरह से चौंकाने वाली है। इन चार जिलों में जिन 1,000 लोगों से बातचीत की गई उनमें से केवल 5 लोगों को ही सरकार की गोल्‍ड स्‍कीम्‍स के बारे में जानकारी थी। सरकार ने सोने की भौतिक मांग को कम करने के लिये इससे जुड़ी कई निवेश योजनाएं शुरू की हैं। स्वर्ण मुद्रीकरण योजना, सॉवरेन गोल्ड बॉन्‍ड योजना और स्वर्ण सिक्का योजना जैसी कई योजनाएं शुरू की गई हैं।

IFMR के शोधकर्ता मिशा शर्मा ने कहा कि,

हमें पता चला है कि लोगों के बीच इन तीन स्वर्ण योजनाओं के बारे में या तो बहुत कम जानकारी है या फिर उनमें कोई जागरूकता नहीं है। ये योजनाएं दो साल पहले केंद्र सरकार ने शुरू की हैं। चार जिलों में से केवल पांच लोगों को ही इसके बारे में जानकारी थी।

प्रो. सहाय ने अध्ययन के निष्कर्ष पर टिप्पणी करते हुए कहा कि

सरकार को इन योजनाओं के बारे में बड़े पैमाने पर प्रचार अभियान चलाना होगा और लोगों के बीच इन्हें प्रचलित करना होगा। सरकार ने इन योजनाओं को वित्तीय समावेशन के एक उपाय के तौर पर पेश किया।

इन योजनाओं को पेश करने के पीछे सरकार का मकसद सोने की भौतिक मांग को कम करना है ताकि सोने के आयात पर खर्च होने वाली विदेशी मुद्रा को बचाया जा सके और घरों में रखे सोने को इस्तेमाल में जाया जा सके। देश में हर साल कई टन सोना आयात किया जाता है जबकि दूसरी तरफ करीब 15,000 टन सोना आभूषण और विभिन्न रूपों में घरों में पड़ा हुआ है। अध्ययन में यह बात सामने आई है कि लोग इन योजनाओं में निवेश के इच्छुक हैं लेकिन उन्हें इसकी पूरी जानकारी नहीं है। इससे पता चलता है कि इन योजनाओं में बेहतर संभावनाएं हैं लेकिन जानकारी का अभाव है।

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सहाय ने कहा कि, मार्केटिंग के प्रयासों को तेज करने के साथ साथ बैंकों को गोल्‍ड लोन के लिए प्रेरित करना होगा। बैंक लोगों को इस प्रकार के ऋण के लिए आश्वस्त करें। इस समय बैंकों की तरफ से इस तरह का कोई प्रयास नजर नहीं आता है। अध्ययन में यह बात भी सामने आई है कि गोल्‍ड लोन का प्राथमिक तौर पर इस्तेमाल घरेलू उपभोग को सामान्य बनाने या फिर कर्ज का भुगतान करने के लिए किया जाता है।

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